शिक्षा से बदलेगी भारत की तस्वीर

शिक्षा

झाड़ू लगाते हुए “भईया कुछ पैसे दे दो कई दिन से कुछ खाया नहीं मैंने”

भीड़ – चल भाग कामचोर, निकम्मा कहीं का!

क्या नाम है रे तेरा ( मैंने ग़ौर से देखते हुए पूछा )- साहेब ” बाबू ” नाम है !

तू पढ़ाई क्यों नहीं करता ? यह जो भीख माँग रहा है तुझे शर्म नहीं आती ?- साहेब काहे का शर्म झाड़ू पोछा करके माँगता हूँ, शर्म तो आप जैसों को आनी चाहिए मेहनत मज़दूरी करके माँगता हूँ तो “कामचोर, निकम्मा और गालियाँ बकते हो” मैं ख़ामोश था थोड़ी देर बाद मुझसे रहा नहीं गया फिर से पूछा-

“बाबू तू पढ़ाई क्यों नहीं करता” ? साहेब पढ़ाई करूँगा तो रोटी कौन जुटाएगा, बूचिया को कौन डॉक्टर बनाएगा?

क्यों रे तेरे माँ बाप कहाँ हैं वे कुछ नहीं करते ?- साहेब होंगे तब तो करेंगे, मैं और बूचिया यतीम हैं हिन्दू हो या मुस्लिम? ” ग़रीब और लाचार हूँ साहब ” क्या उम्र है तेरी ” बस गंदगी साफ़ करने की नहीं, पढ़ने लिखने की है ” (मैं कचरे में क़ीमती पत्थर उसे देख के महसूस कर रहा था) बाबू तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा और तेरी बूचिया को भी ” नहीं नहीं साहेब रहने दो एहसान तो मैं भगवान का नहीं लेता तुम तो इंसान हो, अल्लाह तुम्हें सलामत रखे साहेबअल्लाह! यानी तू मुसलमान है, फिर तू बता क्यों नहीं रहा था? अरे साहेब ! लोग तो अब धर्म जाति देख के भीख देते या मदद करते हैं इसलिए कोई ख़ास लगाव नहीं धर्म जाति से ।

जरुर पढ़े-स्कूल प्रशासन और अभिभावक दोनों की समान जिम्मेवारी है, छात्र।

बाबू तेरा असल नाम क्या है ” अब्दुल समद है साहेब और बूचिया का अमृता ” बूचिया का नाम अमृता? हाँ साहेब बूचिया मुझे स्टेशन पर पड़ी मिली और उसके बाज़ू और कलाई में शिव जी का दृश्य था यही कारण मैंने उसका नाम अमृता रख दिया, ” तो तूने अमृता से पूछा नहीं के उसके माँ बाप किधर हैं कहाँ से है वह ? साहेब ! वह बहुत छोटी थी और गूँगी भी, वैसे साहेब बूचिया का पढ़ने लिखने का बहुत शौक़ है पिछली परीक्षा में प्रथम स्थान आया था उसका ( मुस्कुराते हुए आँख में आँसू भर आये बाबू के ) इतने में ट्रेन आगया बाबू को 100 का नोट थमाया पहले तो इंकार कर दिया पर बड़े भाई समझ कर लेने को कहा तो ले लिया और गले लगा कर अलविदा किया मुझे, शायद अगली सफ़र में फिर से मुलाक़ात हो बाबू से और उमीद करता हूँ कुछ उसकी हालत में सुधार कर सकूँ और बूचिया के साथ साथ उसे भी तालीम से जोड़ सकूँ ॥

नोट: यह सिर्फ़ कहानी नहीं एक हक़ीक़त है बल्कि यह हमारे लिए एक सबक़ है जो बाबू और बूचिया जैसे बच्चों से मिला के तालीम की क्या अहमियत है, जी हाँ यह एक ऐसी दौलत है जिसे न कोई छिन सकता है ना ही ये ख़त्म हो सकता है तो आप सबसे भी गुज़ारिश है ख़ुद भी जुड़े और ऐसे बच्चों को भी जोड़े तालीम से ।

Connect with Us! अपनी राय कमेंट्स में दें. ताजा ख़बरों के लिए हमें फॉलो करें. अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई, तो इसे लाइक और शेयर करना न भूलें. Subscribe our Youtube Channel: AajKaReporter Follow us on: Facebook, Twitter, Instagram