जीवन रथ के सारथी ‘गोपाल’

पूछते हो नाम में क्या रखा है ?

‘गोपाल कृष्णा’ नाम में है एक पालनहार, एक तारनहार और एक कर्मयोगी।

पिता मिथिलेश कुमार और माता अंजु सिन्हा की संतति में ये सारे गुण मौजूद थे। निखारने के लिए जिस कसौटी की तलाश थी वो पूरी हुई अभयानंद सुपर ३० में। उर्मिला सिंह प्रतापधारी सिन्हा फाउंडेशन और इसके ट्रस्टी ए.डी. सिंह द्वारा वित्त प्रदत्त इस संस्था ने गोपाल कृष्णा के ज़िद्द और परिस्थिति को नए पहिये दिए जीवन चक्र को नयी दिशा देने के लिए।

आईआईटी बीएचयू के मेकेनिकल इंजीनियरिंग कर रहे गोपाल के लिए राह आसान न थी। अति साधारण आय वर्ग में आय से ज़्यादा व्यय ने जीवन को जरा जटिल बना दिया था। परिस्थिति जन्य कारकों ने, पिता एक निजी नौकरी में कार्यरत थे और माँ एक अदद गृहिणी। पिता जी को हुए ब्रेन स्ट्रोक से ही नवीं क्लास में कृष्णा को खुद की जगह बना लेने की ज़िद्द लग गयी। आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम होना चाहता था, बड़ी बहन अंजलि सिन्हा का छोटा भाई कृष्णा।

गोपाल की प्रारंभिक शिक्षा महावीरी सरस्वती विद्या मंदिर, माधव नगर, सीवान, बिहार से हुई। प्रतिभावान गोपाल की छात्रवृत्ति ने दसवीं तक की पढ़ाई को सहज बनाये रखा। घर की आय खेती पर निर्भर थी और कृष्णा आत्म निर्भर होने की जुगत में जीवन हल चलाने लगा। कहते हैं चाह उमड़े तो राह बनेगी ही। दसवीं बोर्ड के दौरान ही एक दोस्त ने अभयानंद सुपर ३० के विज्ञापन पर कृष्णा का ध्यान आकृष्ट कराया। प्रतिभा से होगा प्रवेश परीक्षा में चयन और आईआईटी कोचिंग की पढ़ाई और रहने खाने की व्यवस्था भी मुफ़्त। उसे इस विज्ञापन में अपनी सारी समस्याओं का समाधान मिला। कृष्णा के एक रिश्तेदार में पटना सुपर ३० की प्रवेश परीक्षा दिलाने का जिम्मा लिया। कृष्णा और उसके तीन साथी प्रवेश परीक्षा दिए। थोड़े दिनों बाद परिणाम की जानकारी फ़ोन पर मिली। “मेरा चयन हो गया था सुपर ३० में मैम“, ये ख़ुशी मुझसे साझा करते हुए कृष्णा की मुस्कान मन मोह लेती है। “फोन पर दूसरी तरफ पंकज सर थे। हमारे सुपर ३० के तैयारी के दौरान बेहतरीन दोस्त और मार्गदर्शक भी। मेरे परिवार ने इस खुशी को भी त्यौहार की तरह मनाया, उम्मीद की इस किरण ने तत्काल सारे समस्याओं का समाधान कर दिया था, हालांकि अभी सफर लंबा था।”

सुपर ३० ने हमें सिर्फ़ तकनीकी समस्याओं से जूझते सवालों का हल ही नहीं सिखाया, बल्कि जीवन पथ पर सहयोगियों संग आगे पीछे होने की संभावनाओं को भी संभालना सीख गए हम। टेस्ट में आये कम या अधिक मार्क्स से हमारे व्यवहार के मापदंड संतुलित रहें।” न कोई अभिमानी हो न कोई हीन। सुपर ३० के बैच के सभी छात्रों के बीच अच्छा सामंजस्य था फिर भी टेस्ट के वक़्त प्रतिस्पर्धा हावी होती थी, टॉप आने के लिए होड़ लगी रहती थी। ‘सामंजस्य और प्रतिस्पर्धा‘ यह सुपर ३० की विशेषता थी, इस से हमने जीवन का पाठ भी सीखा ‘आपसी ताल-मेल से भी बहुत कुछ किया जा सकता है।’

अभयानंद सर व्यक्तिगत रूप से हमारा मनोबल बढ़ाते। साथ ही पंकज सर , रवि सर, अरुण सर, रश्मि मैम हमारे कोचिंग के दौरान हमें एक पल भी निराश नहीं होने देते। सबकी मेहनत का साझा परिणाम है मेरा आईआईटी के प्रथम प्रयास में ही चयनित हो जाना।”

मुसीबत के क्षण में हताश होने की बजाय धैर्य और सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए और खुद के साथ ईश्वर पर भी भरोसा रखना चाहिए। ईश्वर एक-साथ सभी दरवाजे बंद नहीं करता, कोई न कोई समाधान या राह आपके लिए होता है, जरूरत होती है तो उसे ढूंढने की, समझने की।

समाज को सुचारू रूप से चलाने में सभी व्यक्तियो का सहयोग होना चाहिए, व्यक्तिगत स्तर पर हम हर किसी की सहायता तो नहीं कर सकते किन्तु किसी एक के लिए माध्यम तो अवश्य बन सकते है। जरूरत है नजरिये में बदलाव लाने की और समाज को कुछ वापस करने के लिए कुछ ऐसा करने की जैसा बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद और ट्रस्टी ए. डी. सिंह कर रहे है।

घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों का मान हैं गोपाल कृष्णा अब और अग्रसर है जीवन को नयी गति देने को भी।

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