बहन के त्याग और भाई के मेहनत ने दी समाज को एक नई राह

किसी पेड़ की विशालता इस बात पर निर्भर करती है की उसका देख भाल पौधे के रूप में किस तरीके से किया गया है साथ ही साथ यह इस बात पर भी निर्भर करती है की देख भाल करने वाला माली कौन है और कैसा है।

ठीक इसी प्रकार मानव जीवन मे ‘बचपन’, व्यक्तित्व निर्माण की वह अवस्था है जहाँ स्नेह, प्यार एवं उचित मार्गदर्शन उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए नितांत आवश्यक है। बचपन में माँ का स्नेह, जहाँ बच्चे को भावनात्मक रूप से बेहतर इंसान बनाती है वहीं पिता का मार्गदर्शन आगे जीवन मे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करता है। पर किसी के सर से यदि असमय पिता का साया ही उठ जाए तो उसका बचपना छीन जाता है और पिता द्वारा पुत्र के लिए संजोए अनगिनत ख्वाब धूमिल हो जाते है। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के कारण बच्चों के प्रकाशवान ख्वाब जो पिता के होने मात्र से ही प्राप्य प्रतीत होते, वे सहसा अंधकारमय भविष्य की बली चढ़ जाते है।

कैंसर से लंबे संघर्ष के बाद असमय ही पिता के काल के गाल में समाहित होने के बाद केशव का परिवार, उनके सपने, उसकी पढ़ाई, सब कुछ बिखर गए। पिता के लंबे चले इलाज ने घर को आर्थिक रूप और परिवार को मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था। केशव के पिता जो कि अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे, जिनके असमयिक निधन के कारण परिवार को खाने के लाले पड़ गए, दादा-दादी, मां, दीदी एवं खुद केशव ने कितनी ही रातें बिन खाये गुजारी है, ऐसी स्थिति में पूरे परिवार को भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। केशव उस वक़्त पटना के पाटलिपुत्रा स्थित एक निजी-स्कूल में आंठवी का छात्र था, स्कूल फीस का प्रबंध ना हो पाने के कारण लगा की पढ़ाई छूट जाएगी। ऐसी मुश्किल घड़ी में हौसला दिखाया बड़ी बहन रश्मि ने जो खुद स्नातक अंतिम वर्ष की छात्र थी, उसने न सिर्फ घर-परिवार को भावनात्मक रूप बल्कि मानसिक और आर्थिक रूप से भी संभाला। रश्मि ने खुद अपनी पढ़ाई छोड़, केशव की पढ़ाई एवं घर के खर्चे के लिए प्राइवेट नौकरी करने लगी। केशव पढ़ाई में अच्छा था, यह देखते हुए उसके शिक्षक पंकज ने रश्मि को नवोदित संस्था ‘अभयानंद सुपर 30‘ के मेंटर अभयानंद सर से मिलवाया, रश्मि को वहाँ नौकरी मिली और परिवार को थोडा बल मिला। उसके बाद केशव को भी सुपर 30 के पहले बैच में स्थान मिला। केशव अभयानंद सुपर 30 का पहला ऐसा छात्र है जिसे सिर्फ साक्षात्कार के बाद सीधे प्रवेश मिला था। यही वो वक़्त था जब केशव का परिवार संभलने लगा, हौसले और जज्बे अपने आकार लेने लगे थे। अभयानंद सर के कुशल मार्गदर्शन में सुपर 30 के छात्र केशव के साथ  अन्य 18 बच्चों को भी इस प्रवेश परीक्षा में सफलता मिली। केशव को IIT JEE में 487वां रैंक मिला और वर्तमान में वो दिल्ली आईआईटी के मैकनिकल शाखा में प्रथम वर्ष का छात्र है।

केशव ने फ़ोन पर कहा-

“ऐसा लगता है, सुपर 30 मेरे लिए ही शुरू हुआ था, अभयानंद सर मेरे लिए भगवान ही बनकर आये थे। पापा के जाने के बाद लगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया, मैंने तो हिम्मत खो दी थी, पर अभयानंद सर, पंकज सर, सुपर 30 ने न सिर्फ मुझे संभाला बल्कि संभालते हुए मंजिल तक पहुँचाया भी। सुपर 30 के बाद मैंने फिर पीछे मुड़कर नही देखा। अभयानंद सर पढाई के साथ साथ प्रोसाहित करने के लिए हम स्टूडेंट्स के सदैव साथ होते है।” केशव ने आगे कहा ” अभयानंद और सुपर 30 के कारण मेरा और मेरे स्वर्गीय पिता का सपना साकार हो पाया।”

केशव की माताजी रंजू सिंह जी ने हमारे प्रतिनिधि को बताया कि-

“किसी व्यक्ति की कमी तो कभी पूरी नही की जा सकती लेकिन कोशिश कर के जिया और मेहनत कर के मंजिल पायी जा सकती है। यह बात मेरे बच्चों ने मुझे सिखायी। एक तरफ बुजुर्ग सास-ससुर का गमगीन चेहरा, दूसरी ओर बच्चों के भविष्य की चिंता, मेरे दुःख पर हावी थी। रश्मि ने आगे बढ़कर खुद के साथ घर-परिवार को भी संभाला, में कहती हूँ कि बेटियां बोझ नहीं होती हैं बल्कि वे बोझ बांटती है। “

रश्मि ने बताया-

“पंकज सर ने अभयानंद सर से मिलाया, मुझे वहाँ नौकरी मिली, उन्होंने केशव को सुपर 30 में पढ़ने की अनुमति भी दी। यह मेरे अच्छे दिनों की शुरुआत थी, मुझे समय से वेतन मिलने लगा व भाई के सपने को पंख मिले।” रश्मि ने आगे कहा” आज केशव दिल्ली आईआईटी में है। केशव की सफलता पर दादा-दादी, मां ही नहीं सारा गांव गर्व करता है। पापा केशव को बचपन से ही इंजीनियर बनाना चाहते थे किंतु…पिताजी जहाँ भी होंगे खुश होंगे… अब पीछे मुड़कर देखती हूं तो सोचती हूं कि पापा के बाद… सुपर 30 नही होता तो क्या होता… इस संस्थान ने न केवल एक छात्र की ज़िंदगी सँवारी बल्कि एक परिवार को भी गोद ले लिया।”

ओढनपुर के संजू देवी ने बताया कि-

“लखन चाचा के परिवार पर विपदा ही तो थी कि कैंसर ने उनके बेटे विनय को असमय लील लिया लेकिन भगवान इतना निष्ठुर भी नहीं होता, एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरे कई दरवाजे खोल देता है। भगवान खुद न आकर किसी को भेजते है, पैसे की तंगी के बाबजूद केशव आईआईटी में गया, जिन लोंगो ने केशव के परिवार की मदद की है भगवान उनकी मदद करेगा।”

ओढनपुर के ही सीताराम जी ने कहा कि ” बहुत सुना था अभयानंद जी के बारे में, देख भी लिया, बिना बाप के बच्चे का जिनगी बना दिये। भगवान उनका सबका भला करे, सुपर 30 के सब बच्चा सफल हो।”

पिता का असमय देहांत, रश्मि का बुरे वक्त में भी हिम्मत न हारना, केशव की कामयाबी यहीं बयां करती है कि सफलता उसे ही मिलती है जो मुसीबत के समय भी हौसला को बुलंद रखता है और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है। यह अनुभव एक सीख है उनलोगों के लिए जो असुविधाओं का बहाना करते रहते है और बुरे समय का रोना रोते रहते हैं। रश्मि का त्याग, केशव की मजबूत इक्षाशक्ति और अनुभवी मेंटर अभयानंद सर ने दिखा दिया कि सही दिशा में सही नियत से सही समय पर किया गया प्रयास सार्थक होता है और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।

‘अभयानंद सुपर 30’ उर्मिला सिंह प्रताप धारी सिन्हा फाउंडेशन के द्वारा स्पांसर्ड है। इसके ट्रस्टी श्री ए. डी. सिंह एक सफल व्यवसायी है, जिनका व्यवसाय देश ही नही विदेशों में भी फैला है। उनकी जड़े बिहार राज्य के पटना जिले के दुलहिन बाजार प्रखंड अंतर्गत एनखान गांव से जुड़ी है। उन्होंने अपने स्वर्गीय माता उर्मिला सिंह एवं स्वर्गीय पिता प्रताप धारी सिन्हा जी के पुण्य स्मृति में स्थापित उर्मिला सिंह प्रताप धारी सिन्हा फाउंडेशन का निर्माण किया है जिसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में वे सामाजिक कार्यो में निस्वार्थ रूप से अपना योगदान देते रहते हैं।

‘आज का रिपोर्टर’ अभयानंद सर, पंकज सर, ए. डी. सिंह एवं उनकी समस्त टीम को उनके इस सामाजिक संबलता के प्रतीक ‘अभयानंद सुपर 30’ के लिए धन्यवाद एवं अनेक अनेक शुभकामनाये देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।

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