सुविधवंचित छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत बने IITian शशि

“न संघर्ष न तकलीफें फिर क्या मजा है जीने में…

  तूफान भी रूक जाएगा जब लक्ष्य रहेगा सीने में…”

लक्ष्य के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ हो तो किसी भी प्रकार का व्यवधान उसे हासिल करने से नहीं रोक सकता। जिस प्रकार बिहार के गया जिला निवासी ‘दशरथ मांझी’ ने अपने अटल इरादों से अचल पर्वतों के बीच रास्ता बना दिया, यह उनका अपने लक्ष्य के प्रति दीवानगी ही था कि उन्होंने उस असंभव से काम को अकेले ही संभव कर दिखाया। आज वे सिर्फ अपने देश में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में अपने लक्ष्य को पूरा करने लिए अदम्य साहस, अटूट साधना से मिली सफलता का उदाहरण है।

प्रतिभाओं के राज्य बिहार में, ‘ज्ञान व मोक्ष’ दोनों के ही प्राप्ति स्थान के रूप में प्रसिद्ध शहर ‘गया’ के फिज़ाओ में ही ज्ञान विद्यमान है। जीवन पर्यंत ज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। आइए ज्ञान की नगरी ‘गया’ के अनेकों प्रेरक कहानियों में से एक ‘शशि मोदी’ की कहानी आपसे साझा करते हैं। एक आम छात्र, लेकिन जिसके इरादे दशरथ मांझी की तरह दृढ़ है, जिसने विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा, वो कहते हैं ना कि जब किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात आपको मिलाने में लग जाती है। ऐसा ही जब इनके जीवन का एकमात्र turning पॉइंट आया तो उन्होंने उस मौके को समय रहते लपक लिया। ज्ञानी कह गए हैं कि जीवन में किस्मत सिर्फ एक बार दरवाजा खटखटाती है, यदि आपने उस मौके को नहीं गवाया तो आपका पूरा भविष्य स्वर्णिम होगा। उसी के परिणामस्वरूप गया का यह मध्यमवर्गीय छात्र शशि आज आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल शाखा का छात्र है।

कुल चार जनों के परिवार में शशि के पिता शंभु प्रसाद बिजली के तार की मार्केटिंग करने वाली कंपनी में सैल्समैन है, माँ रेणु देवी गृहणी और बड़े भाई जो कि स्नातक करने के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहे है। शशि का परिवार गया के वैतरणी तालाब के पास मयूर विहार कॉलोनी में रहता है। पिता अपने काम के कारण अक्सर दौरों पर बाहर ही रहते है।

शशि की प्रारंभिक पढ़ाई नानी घर अकबरपुर, नवादा जिले में हुई। दसवीं के बाद शशि को आगे क्या करना है यह समझ नहीं आ रहा था किंतु इसको लेकर बेचैनी जरूर थी। अपने संबंधियों से उसका अक्सर यही सवाल होता था कि आगे क्या करूँ? सवाल एक ही था किंतु जवाब की जगह सलाह हज़ार थे, किन्तु स्पष्टता किसी की भी सलाह में नही थी।

दिग्भ्रमित शशि अपनी ही सोच में उलझता जा रहा था कि मामाजी ने अखबार में छपे ‘अभ्यानंद सुपर 30’ की प्रवेश परीक्षा के बारे में बताते हुए कहा “यह तुम्हारे सारे सवालों के जवाब के साथ-साथ भविष्य पर लगे ताले की चाबी है, यदि चाबी तुम्हारे हाथ लग गयी तो तुम्हारा ‘कल’ उज्ज्वल है।”

यह वही दिन था जब शशि ने पहली बार आईआईटी के बारे में जाना। उसे उम्मीद की किरण तो दिखी किन्तु धुंध के साथ, कोई और विकल्प भी तो नहीं था। शशि ने उम्मीदों का दामन थाम प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन किया, द्विस्तरीय परीक्षा में सफल भी रहा। चयन की खबर मिलते ही पूरे परिवार ने इस खुशी को त्योहार की तरह मनाया। सारा परिवार खुश था, तत्काल समस्या से निजात तो मिला ही साथ  में परिवार को उम्मीद, शशि के सपनों को एक मंच, आसमान की ऊंचाइयों को छूने का एक माध्यम मिला था।

माहौल बदला, घर से दूर आकर रहना, इसलिए शुरुआत में सुपर-30 में एडजस्ट करने में परेशानी हुई। किन्तु जल्द ही समझ आ गया कि कुछ पाना हो तो कुछ खोना पड़ता है है। पढ़ाई के साथ ग्रुप में ‘compete & collbrate’ के फायदे दिखने लगे, सुपर 30 में कुल 22 छात्र थे और टेस्ट के दौरान सभी प्रतिस्पर्धी होते किंतु टेस्ट की समाप्ति के बाद  फिर एक साथ, एक दूसरे की मदद करते हुए पढ़ाई करते। ‘Test & Discussion’ सुपर-30 का अभिन्न अंग था। प्रत्येक दिन टेस्ट होता और उसके पश्चात discussion जिससे सभी के कांसेप्ट क्लियर होते जाते। शशि कहते हैं कि “हमने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के पहले ही इतनी गलतियां कर ली कि कोई भी गलती बाकी ही नहीं रही। प्रत्येक दिन टेस्ट देने के कारण एग्जाम का डर भी जाता रहा।”

“सुपर-30 यह एक शानदार पहल है, जो हम ऐसे सुविधावंचित छात्रों के लिए एक मौका लेकर आता है और हमारा जीवन संवार देता है। ऐसी पहल हर क्षेत्र के लिए और हर जगह होनी चाहिए। सुपर 30 में आकर ऐसे अनुभवी शिक्षकों, प्रतिभावान छात्रों के समूह में रहकर खुद को जीने और जानने का मौका मिलता है। पंकज सर हमें हौसले से एक करते थे तो वहीं अभ्यानंद सर के मार्गदर्शन और मोटिवेशन से हमारा आत्मविश्वास इतना बढ़ा की हम रैंक के लिए सोचने लगे थे।”

शशि की कहानी जानकर ऐसा महसूस हुआ की जीवन में आये मुश्किलों से हताश नही होना चाहिए बल्कि हौसलें से उसका सामना करना चाहिए। मुश्किल में छिपे अवसर और अवसर में छिपे मुश्किल को समझना चाहिए। शशि का सफर अभी काफी लंबा है, किन्तु इस कामयाबी ने उसे एक ऐसा मंच दिलाया, जहां उसे सर्वश्रेष्ठ संस्थान के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक निखारने में मदद करेंगे। शशि की यह कामयाबी ‘छात्र-शिक्षक’ के  सामंजस्य की कामयाबी है। छात्रों की सफलता-असफलता का श्रेय शिक्षक को भी जाता है। शशि के जज्बे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का साथ मिला। लेकिन आज भी भारत जैसे विकासशील देश में कितने असंख्य छात्र ऐसे है जिन्हें प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पाती तो उच्च शिक्षा के बारे में सोचना भी मुश्किल हैं। किंतु समाज में कुछ ऐसे भी व्यक्ति है जो ‘देश का कल’ संवारने के लिए आज काम कर रहे है।

‘आज का रिपोर्टर’ सलाम करता है पूर्व डीजीपी अभयानंद, शिक्षक पंकज, अरुण, रवि व सुपर-30 के टीम के सभी अन्य सहयोगी सदस्यों और ‘उर्मिला सिंह प्रतापधारी सिन्हा फाउंडेशन’ व इसके ट्रस्टी श्री ए. डी. सिंह को जिन्होंने आगे बढ़कर इन सुविधावंचित बच्चों को ‘कल के भविष्य’ के रूप में सवांरने की सफल व सार्थक पहल की हैं। समाज को जरूरत है ऐसे लोगों की जो अन्य जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए आगे आएं। इन कहानियों के माध्यम से हम सुविधावंचित छात्रों को इस ‘एक मौके’ के बारे में बताना चाहते है ताकि अधिक से अधिक लोगो को इसके बारे में जानकारी हो और प्रतिभाशाली बच्चों को इसका लाभ मिल सके। हम यहाँ इस मंच से समाज के सुविधायुक्त व सामर्थ्यवान लोगों से अपील भी करते है कि वो भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझे व समाज के आधारस्तम्भ आम निर्धन जनों के लिए ऐसे ‘मौके’ मुहैया करवाने का प्रयास करे।

और अंत में;

“ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट…

इसलिए तू इंतज़ार न कर…

आस कभी खत्म न कर

‎बुलंदियाँ छुएगा हज़ार 

इसलिए ‎तू प्रयास से न डर…”

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