मन के मिले ईश ‘सुपर 30’ में

इंजीनियर या डॉक्टर तो सभी बनते हैं, इसमें ऐसा नया क्या है। ये हमारी बदनियती ही है कि, २१वीं सदी में भी भारत जैसे विशाल देश के कई गांव बारहखड़ी के इंजीनियर वाले ” ” और डॉक्टर के ” ” वाले अक्षर से महरूम हैं और उनकी सुविधाओं से वंचित भी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ये हम सभी की साझा असफलता है। पर इन सब के बीच हर माता-पिता जो निरा अनपढ़ हो या थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा, अपनी संतति के शिक्षित होने की कामना अवश्य करता है।

और ऐसी अनेक प्रार्थनाओं को मंज़िल देती हैं भारत भर में फैली अनेक संस्थाएं। ऐसी ही एक संस्था है ‘अभयानंद सुपर ३०’ जो किसी प्रार्थनारत माता-पिता या छात्र की जरूरतों पर हर संभव खरा उतरने की कोशिश करती है, और उतरती भी है। ‘उर्मिलासिंह प्रतापधारी फाउंडेशन‘ व इसके ट्रस्टी ए.डी. सिंह द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त यह संस्था बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के मार्गदर्शन में चलाई जा रही है। इनके सहयोगी दल में पंकज, रवि, अरुण, रश्मि जैसे कुशल संचालक शामिल हैं, जिनसे ये सुपर ३० के कांसेप्ट को साकार कर पाती है।

एक ऐसी ही कामना की रवि रंजन सिंह जो एक निजी अस्पताल में बतौर सहायक कम्पाउंडर कार्यरत हैं, और पत्नी संध्या देवी जो एक गृहिणी हैं। मशरख छपरा ब्राहिमपुर के ओझा पट्टी गांव में एक संयुक्त परिवार में पला बढ़ा मनीष रंजन जो अभी दिल्ली आईआईटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग का छात्र है। आईआईटी में ८५४ रैंक पर आना इतना आसान तो न था। पर मनीष का ज़ज्बे और पिता की ख्वाहिशों ने ये सफर सहज बना दिया।

मनीष के चाचा और ताऊ गुजरात और मुंबई में कार्यरत थे, जबकि उनका समस्त परिवार गांव में ही रहता था। मनीष जो अपने माता-पिता की अकेले संतान हैं, पिता चाहते थे कि खुद बड़े परिवार और उनकी जिम्मेवारिओं के बीच स्वयं तो उच्च शिक्षा नहीं ले पाए थे परन्तु बेटे को इससे वंचित नहीं रखना चाहते थे।

रवि रंजन सिंह अपने परिवार के साथ बच्चे की अच्छी शिक्षा हेतु छपरा शिफ्ट कर गए। प्राथमिक शिक्षा वहां के स्पर्धा स्कूल में करने के बाद मनीष ने अपनी पढाई छपरा सेंट्रल स्कूल से की। दसवीं की सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा मनीष ने शत प्रतिशत अंकों से पास की। मनीष ‘सुपर ३०’ के बारे में सातवीं दर्ज़े में ही जान गया था और घर की आर्थिक स्थिति को भांपते हुए इसमें उसने अपनी जगह बनाने का भी निर्णय लिया। २६ मार्च २०१७ को उसने अभयानंद सुपर ३० का टेस्ट दिया और यहाँ की प्रवेश परीक्षा में उसने अपनी जगह बना ली। १२वीं की परीक्षा मनीष ने सेंट्रल पब्लिक स्कूल पटना से ९३ % अंकों के साथ पास की।

कोचिंग के दौरान अपने अनुभवों का जिक्र करके मनीष फूले नहीं समाता। सुपर ३० की कामयाबी सिर्फ़ आईआईटी तक ही सीमित नहीं, हम जीवन में आने वाली हर उस चुनौती के लिए तैयार कर दिए गए, जो शैक्षणिक स्तर पर हो व्यक्तिगत स्तर पर। अलग अलग पृष्ठभूमि के सहपाठियों संग तालमेल हमे जीवन के अधिकांश गुर सीखा गया।

यहाँ गुरुओं के निकटता और आत्मिक लगाव का एक वाकया मनीष बताते हुए कहता है, ”हम ११ बच्चे यहाँ से किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना के लिए चयनित हुए थे, उनमें एक नाम मेरा भी था। जिस दिन इसका परिणाम आया उसी दिन हमारी आईआईटी मेंन की परीक्षा थी। सर ने हम सब को न बताने का फैसला किया ताकि हम अधिक उत्साहित या हतोत्साहित न हो। हमारा ध्येय निश्चित और निर्धारित हो। और हुआ भी ऐसा। प्रथम प्रयास में ही हमारा चयन आईआईटी में हो गया।”

सुपर ३० ने मेरे साथ मेरे पिता की खुशियों पर भी अपनी मुहर लगायी।

व्यवसायी ए. डी. सिंह अपने कारोबार के सिलसिले में दुनिया के कई देश भ्रमण किया हौ, और जाना कि समाज के पिछड़े तबकों का विकास जरूरी है, उनका विकास ही समाज को जीवंत बनाये रख सकता है। ए. डी. सिंह ने अपने विचारों को निष्पादित करने के लिए, माता-पिता को श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम पर ‘उर्मिला सिंह प्रतापधारी सिन्हा फाउंडेशन’ की स्थापना की। उनके इस अभियान को साकार करने की तलाश बिहार के शिक्षाविद व पूर्व डीजीपी रह चुके अभयानंद पर आकर समाप्त हुई। प्रतिभा और लक्ष्मी का मेल हुआ, तो ‘अभयानंद सुपर 30’ की स्थापना हुई और स्थापना के पहले वर्ष में ही 19 छात्रो का चयन आईआईटी में हुआ। नियत सकारात्मक होने के कारण नियति भी शानदार रही।

‘हम’ समाज के हर व्यक्ति से गुजारिश करते है कि अपने आस-पास के हर सुविधावंचित परिवार को इस और ऐसे ही हर ‘मौके’ के बारे में जरूर बताएं, हो सकता है कि उनकी जिंदगी संवर जाए। सक्षम व्यक्तियों को भी इस प्रकार की पहल करनी चाहिए ताकि सुविधावंचितों को और अधिक मौके मिले, और अधिक से अधिक परिवारों का जीवन संवर सके। ऐसे भी किसी ने कहा है “मदद करते चलिए, आपको भी नही मालूम कब भगवान आपको भी किसी का भगवान बनाकर पहुंचा दे।”

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Rani Kashyap
माँ पहली गुरु और उनका समस्त जीवन ही पाठशाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। पढ़ना, पढ़ाना, गीत-संगीत सभी या यूं कहे की वीणावादिनी से हर बार स्वर देने की इच्छा आप तक लायी है। परिवार और मित्रों का अप्रतिम सहयोग और आशीर्वाद भी मेरी शिक्षा का अभिन्न पाठ। इन सभी से ऊपर अपने मौन से संवाद जहाँ अक्षर बनने की कोशिश में है शब्द और शब्द, वाक्य। परम्परागत शिक्षा को एक बार चुनौती दी मौन ने कि, साहित्य में "डूबना मत की डूबते तो वो हैं की जिन्हे गहराई का पता नहीं होता" कई वर्ष मुखर होने के बाद भी दो पल का मौन है अभिन्न गुरु और प्रेरक जो वंदनीय है।